जेल सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल: प्रतिबंधित सामान की तस्करी नहीं थम रही, संसदीय समिति ने मांगे सख्त सुधार

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देश की जेलों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। केंद्रीय गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति की हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि तमाम सुरक्षा इंतजामों के बावजूद मोबाइल फोन और अन्य प्रतिबंधित सामान लगातार जेल परिसरों तक पहुंच रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार यह समस्या केवल तकनीकी कमियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानव स्तर पर भी गंभीर चूक और मिलीभगत देखने को मिल रही है।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कई जेलों में लगाए गए जैमर, सीसीटीवी कैमरे और अन्य सुरक्षा उपकरण अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। इन व्यवस्थाओं के बावजूद कैदियों तक मोबाइल फोन, सिम कार्ड, चार्जर और अन्य प्रतिबंधित वस्तुएं पहुंचना सुरक्षा प्रणाली की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है। इससे जेल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत महसूस की गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, प्रतिबंधित सामान जेलों तक पहुंचाने में कुछ मामलों में जेल कर्मचारियों के साथ-साथ अस्पताल से जुड़े कर्मियों की भूमिका भी सामने आई है। समिति का मानना है कि यदि आंतरिक स्तर पर ईमानदार निगरानी सुनिश्चित नहीं की गई तो केवल आधुनिक उपकरण लगाने से समस्या का समाधान संभव नहीं होगा। इसलिए जवाबदेही तय करना भी उतना ही आवश्यक है जितना तकनीकी संसाधनों को बढ़ाना।

संसदीय समिति ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कई जेलों में कर्मचारी लंबे समय तक एक ही स्थान पर तैनात रहते हैं। लंबे समय तक एक ही जेल में पदस्थ रहने से कुछ मामलों में कैदियों और कर्मचारियों के बीच अनुचित संबंध विकसित होने की आशंका बढ़ जाती है। इसी कारण समिति ने नियमित अंतराल पर कर्मचारियों के तबादले की व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की है, ताकि किसी भी प्रकार की सांठगांठ की संभावना कम हो सके।

रिपोर्ट में केंद्र सरकार से आग्रह किया गया है कि राज्यों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं और जेलों की सुरक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए। समिति का कहना है कि केवल निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से लागू कराने के लिए भी ठोस व्यवस्था विकसित करनी होगी।

सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाने के लिए रिपोर्ट में डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर, हैंड हेल्ड मेटल डिटेक्टर, बैगेज स्कैनर, बॉडी वॉर्न कैमरे, हाई-रिजॉल्यूशन सीसीटीवी नेटवर्क, डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम और अन्य आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता बढ़ाने की सिफारिश की गई है। इसके साथ ही इन उपकरणों के नियमित रखरखाव और समय-समय पर उनकी कार्यक्षमता की जांच करने पर भी जोर दिया गया है।

समिति ने न्यायिक प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग व्यवस्था का विस्तार करने की सलाह भी दी है। रिपोर्ट के अनुसार यदि अधिक से अधिक पेशियां जेल परिसर से ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कराई जाएं तो सुरक्षा जोखिम कम होगा, अतिरिक्त पुलिस बल की आवश्यकता घटेगी और कैदियों के आवागमन में होने वाले खर्च में भी कमी आएगी।

रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि जेलों में सुरक्षा व्यवस्था केवल उपकरणों पर निर्भर नहीं रह सकती। कर्मचारियों का नियमित प्रशिक्षण, निगरानी तंत्र की पारदर्शिता, अनुशासन और समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं भी समान रूप से जरूरी हैं। यदि इन सभी पहलुओं पर एक साथ काम किया जाए तो जेलों के भीतर होने वाली अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।

समिति ने सुझाव दिया है कि राज्यों की जेलों में सुरक्षा मानकों का समय-समय पर स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाए। जिन जेलों में लगातार सुरक्षा संबंधी चूक सामने आती है, वहां विशेष निरीक्षण अभियान चलाकर कमियों को दूर किया जाना चाहिए। साथ ही प्रत्येक जेल में जवाबदेही तय करने की स्पष्ट व्यवस्था विकसित करने की भी आवश्यकता बताई गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित मानव संसाधन और सख्त प्रशासनिक निगरानी—इन तीनों के समन्वय से ही जेलों में प्रतिबंधित सामान की तस्करी पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है। संसदीय समिति की यह रिपोर्ट जेल सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देती है और उम्मीद जताती है कि केंद्र एवं राज्य सरकारें इन सिफारिशों को गंभीरता से लागू करेंगी, ताकि देश की जेलों को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जा सके।