गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के वंदे मातरम के सिर्फ शुरुआती दो पैरा गाने के फैसले पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इसे हैरान करने वाला और देशविरोधी फैसला बताते हुए कहा कि कांग्रेस ने 1937 में राष्ट्रगीत को लेकर जो निर्णय लिया था, उसे अब दोबारा लागू किया जा रहा है।
शाह ने आरोप लगाया कि 1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम के कुछ हिस्सों को हटाकर मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति की थी। उनके मुताबिक, उस समय लिए गए फैसले ने दो-राष्ट्र सिद्धांत को मजबूती दी और आगे चलकर देश के विभाजन की परिस्थितियां बनीं।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस का सिर्फ दो पैरा गाने का फैसला वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति से जुड़ा हुआ है। शाह ने दावा किया कि देश में अब तुष्टीकरण की राजनीति नहीं चलेगी और भारतीय जनता पार्टी इस फैसले का जनता के बीच, संसद और विधानसभा में भी विरोध करेगी।
शाह के बयान पर कांग्रेस ने पलटवार किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल ने कहा कि वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और यह लोगों के लिए भावनात्मक मुद्दा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा इस विषय को राजनीतिक मुद्दा बना रही है।
विवाद की शुरुआत 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में हुए स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के बाद हुई थी। भाजपा ने आरोप लगाया था कि कार्यक्रम में वंदे मातरम के पूरे गायन को रोकने की कोशिश की गई। इसके बाद सोशल मीडिया पर वीडियो साझा कर कांग्रेस नेताओं के रवैये पर सवाल उठाए गए।
कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि कार्यक्रम में पूरा वंदे मातरम गाया गया था और इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं हुई। पार्टी की ओर से सफाई दी गई कि कार्यक्रम के दौरान सोनिया गांधी का इशारा गीत रोकने के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय से खड़े पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मांगने को लेकर था।
इसके बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने फैसला किया कि पार्टी के सभी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के छह में से शुरुआती दो पैरा ही गाए जाएंगे। कांग्रेस का कहना है कि यह फैसला पार्टी की परंपरा और ऐतिहासिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
वंदे मातरम के आधिकारिक स्वरूप और इसके गायन को लेकर 2026 में केंद्र सरकार की ओर से भी कई निर्देश जारी किए गए हैं। इनमें पूरे आधिकारिक संस्करण, सही पाठ और तय प्रोटोकॉल का पालन करने की बात कही गई है। हालांकि, केवल छह छंद पूरे नहीं गाने को लेकर अलग से सजा का स्पष्ट प्रावधान नहीं बताया गया है।
वंदे मातरम के इतिहास की बात करें तो इसे बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था और बाद में यह स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख गीत बन गया। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सार्वजनिक रूप से गाया था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का एक प्रमुख नारा भी बना।
1937 में वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए चुनने के पीछे धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवाद को प्रमुख कारण बताया गया था। उस समय यह तर्क दिया गया था कि शुरुआती दो छंदों में ऐसे धार्मिक संदर्भ नहीं हैं, जिनसे किसी समुदाय की भावनाएं आहत हों। इसी ऐतिहासिक फैसले को लेकर अब शाह और कांग्रेस के बीच राजनीतिक विवाद फिर तेज हो गया है।

