सैम पित्रोदा का केंद्र पर निशाना: बोले- गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों की बात करना ‘दिमागी नक्सल’ नहीं

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सैम पित्रोदा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, RSS प्रमुख मोहन भागवत और केंद्र सरकार से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों के पक्ष में आवाज उठाना नक्सलवाद या कम्युनिज्म नहीं कहा जा सकता।

पित्रोदा ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में इंसानियत को सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, समाज के अलग-अलग वर्गों के अधिकारों और उनकी स्थिति पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा है।

उन्होंने भारत में अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए। पित्रोदा के मुताबिक, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और बौद्ध समुदाय के लोगों से सीधे यह पूछा जाना चाहिए कि वे मौजूदा समय में भारत में खुद को किस तरह महसूस करते हैं।

उन्होंने कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि सभी समुदायों का सम्मान किया जाता है। उनके अनुसार, वास्तविक स्थिति का आकलन लोगों के अनुभव और उनके साथ होने वाले व्यवहार से किया जाना चाहिए।

पित्रोदा ने 2014 से पहले की सरकारों के काम का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश में कई महत्वपूर्ण संस्थान और व्यवस्थाएं लंबे समय में तैयार हुई हैं और आज उनका फायदा देश को मिल रहा है।

उन्होंने IIT और IIM जैसे संस्थानों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन संस्थानों से पढ़े लोग आज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे हैं। उनके मुताबिक, देश की संस्थागत व्यवस्था तैयार करने में पहले के नेतृत्व की भी भूमिका रही है।

भारत की 7.8% आर्थिक वृद्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए पित्रोदा ने कहा कि केवल GDP बढ़ना ही पर्याप्त नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि आर्थिक विकास का वास्तविक लाभ समाज के आम लोगों तक कितना पहुंच रहा है और इसका वितरण कितना समान है।

उन्होंने राहुल गांधी को लेकर भी अपनी राय रखी और उन्हें मजबूत नेता बताया। पित्रोदा ने कहा कि राहुल गांधी में बौद्धिक क्षमता, दृढ़ता और अपने विचारों पर विश्वास है और वे कांग्रेस की विचारधारा को सामने रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

संस्थाओं की स्वतंत्रता के मुद्दे पर भी पित्रोदा ने चिंता जताई। उन्होंने न्यायपालिका, चुनाव आयोग, ED, आयकर विभाग और पुलिस जैसी संस्थाओं की स्वतंत्रता को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए सत्ता के अधिक केंद्रीकरण पर सवाल उठाए।

संसद के मानसून सत्र को लेकर पित्रोदा ने कहा कि कई बार सदन में मुद्दों पर गंभीर चर्चा के बजाय सांसदों के बीच तीखी बहस देखने को मिलती है। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत रखने और अलग-अलग विचारों पर सार्थक चर्चा की जरूरत पर जोर दिया।