सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला-कमाल मौला विवाद में शुक्रवार की नमाज को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टता देते हुए कहा है कि मुस्लिम समुदाय को विवादित भोजशाला परिसर के भीतर नहीं, बल्कि उससे सटी हुई जमीन पर नमाज अदा करने की अनुमति दी जाएगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई नया आदेश नहीं है, बल्कि पहले दिए गए अंतरिम निर्देश को स्पष्ट रूप से लागू करने के लिए स्थान तय किया गया है। कोर्ट के अनुसार संबंधित जमीन तक पहुंचने के लिए अलग रास्ता उपलब्ध है, इसलिए इससे विवादित परिसर की स्थिति प्रभावित नहीं होगी।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान नक्शे का अध्ययन किया और उस स्थान को उपयुक्त माना जिसे सुनवाई में ‘येलो साइट’ के रूप में दर्शाया गया था। अदालत ने कहा कि यह भूमि भोजशाला परिसर के बिल्कुल निकट स्थित है और वहां तक स्वतंत्र पहुंच संभव है। मुस्लिम पक्ष ने भी इस स्थान पर सहमति जताई, जिसके बाद अदालत ने शुक्रवार की नमाज के लिए इसी जगह को स्वीकार कर लिया। यह व्यवस्था केवल अंतरिम तौर पर लागू रहेगी और मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त को की जाएगी।
अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह नमाज के दौरान आवश्यक प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी इंतजाम सुनिश्चित करे। कोर्ट ने कहा कि राज्य का दायित्व है कि वह सभी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे और ऐसी व्यवस्था बनाए जिससे धार्मिक गतिविधियां शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सकें। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि प्रशासन को भीड़ नियंत्रण, प्रवेश-निकास और सुरक्षा के समुचित प्रबंध करने होंगे ताकि किसी प्रकार का तनाव उत्पन्न न हो।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांत पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के आधार पर किसी समुदाय के धार्मिक अधिकारों को रोका नहीं जा सकता। अदालत के अनुसार कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, जबकि नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक अधिकारों का संरक्षण मिलना चाहिए। इस टिप्पणी को सुनवाई का अहम संवैधानिक पक्ष माना जा रहा है।
मुस्लिम पक्ष ने अदालत को बताया कि जिला प्रशासन द्वारा पहले जो वैकल्पिक जमीन उपलब्ध कराई गई थी, वह भोजशाला परिसर से काफी दूर स्थित है। पक्षकारों ने दलील दी कि सड़क मार्ग से उसकी दूरी लगभग 1.3 किलोमीटर और सीधी दूरी करीब 900 मीटर है, इसलिए उसे ‘निकट स्थित वैकल्पिक स्थान’ नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर उन्होंने अदालत के समक्ष नए विकल्प प्रस्तुत किए और परिसर से सटी जमीन पर अनुमति देने की मांग की।
सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की ओर से कई संभावित स्थानों का नक्शा भी पेश किया गया। बताया गया कि इनमें से अधिकांश भूमि दरगाह या वक्फ से संबंधित है और उनके उपयोग को लेकर स्थानीय स्तर पर कोई विशेष आपत्ति नहीं है। अदालत ने इन विकल्पों पर विचार करने के बाद उस स्थान को प्राथमिकता दी जो विवादित परिसर के सबसे अधिक निकट होने के साथ-साथ स्वतंत्र पहुंच की सुविधा भी प्रदान करता है।
मध्य प्रदेश सरकार ने सुनवाई के दौरान मुख्य रूप से कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था पर अपना पक्ष रखा। राज्य ने अधिकारों के अंतिम निर्धारण पर विस्तृत बहस करने से परहेज किया और कहा कि उसका उद्देश्य अदालत के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना है। सरकार ने यह भी संकेत दिया कि यदि भविष्य में दोनों पक्षों की सहमति बने तो किसी अन्य उपयुक्त निजी भूमि पर भी व्यवस्था विकसित करने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि शुक्रवार की नमाज केवल निर्धारित समय, यानी दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच ही अदा की जाएगी। अदालत ने इस समय-सीमा को स्पष्ट रखते हुए प्रशासन को उसी अनुरूप व्यवस्था करने को कहा है। इससे पहले आदेश की व्याख्या को लेकर जो अस्पष्टता बनी हुई थी, उसे दूर करने का प्रयास किया गया है ताकि भविष्य में किसी प्रकार का भ्रम या विवाद पैदा न हो।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्ष आपसी सहमति से कोई दूसरा अधिक उपयुक्त स्थान तय कर लेते हैं, तो अदालत की ओर से उस पर कोई रोक नहीं होगी। इस टिप्पणी को अदालत द्वारा संवाद और सहमति आधारित समाधान को प्रोत्साहन देने के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि फिलहाल प्रभावी व्यवस्था वही रहेगी जो अदालत ने सर्वे नंबर 596 की जमीन के संबंध में तय की है।
भोजशाला-कमाल मौला विवाद लंबे समय से संवेदनशील धार्मिक और कानूनी मुद्दा बना हुआ है। ताजा आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम अधिकारों का निर्णय नहीं दिया है, बल्कि अंतरिम व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक संतुलन के बीच एक व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किया है। अब सभी पक्षों की निगाहें 5 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस विवाद से जुड़े अन्य कानूनी पहलुओं पर आगे विचार किया जाएगा।

